श्रीलंका में गहराते आर्थिक संकट के बीच राजनीतिक उथल-पुथल का दौर जारी है। इस बीच मंगलवार को देश की संसद ने प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को राष्ट्रपति चुन लिया। 73 वर्षीय विक्रमसिंघे ने राष्ट्रपति बनने के बाद सांसदों का शुक्रिया जताया। उन्हें 225 सांसदों में 134 का समर्थन मिला। जबकि उनके खिलाफ उम्मीदवार बनाए गए सत्तासीन दल के सांसद दुल्लास अलाहाप्पेरुमा को 82 सांसदों का समर्थन मिला।

पांच दशक के राजनीतिक करियर में विक्रमसिंघे पहली बार राष्ट्रपति पद तक पहुंचे हैं। इससे पहले वे रिकॉर्ड छह बार प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं। हालांकि, अब तक यह साफ नहीं है कि आखिर संसद में जिस नेता की पार्टी के पास सिर्फ एक सीट हो, उन्हें देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचने का मौका कैसे मिला? इसके अलावा विक्रमसिंघे आखिर हैं कौन? उनका राजनीतिक इतिहास क्या रहा है? आइए जानते हैं…

कौन हैं रानिल विक्रमसिंघे?
रानिल विक्रमसिंघे का जन्म 24 मार्च, 1949 को श्रीलंका के कोलंबो में एक संपन्न परिवार में हुआ। पिता एस्मंड विक्रमसिंघे पेशे से वकील थे। इसके अलावा उनके चाचा जूनियस जयवर्धने श्रीलंका के राष्ट्रपति भी रह चुके थे। विक्रमसिंघे के परिवार की पकड़ राजनीति, व्यापार के साथ मीडिया जगत में भी रही।

हालांकि, रानिल ने अपने पिता की ही राह पकड़ी और सिलोन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की। वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1970 के दशक में विक्रमसिंघे ने राजनीति में एंट्री ली। उनका राजनीतिक करियर यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) के साथ शुरू हुआ।

1977 में उन्होंने संसदीय चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इस जीत के बाद उन्हें विदेश मंत्रालय में उपमंत्री का पद सौंपा गया। विक्रमसिंघे ने युवा और रोजगार मंत्रालय समेत कई अन्य मंत्रालय भी संभाले।

विक्रमसिंघे के करियर में अगला बड़ा मौका आया 1990 के दशक में। 1993 में राष्ट्रपति रानासिंघे प्रेमदास की हत्या के बाद रानिल विक्रमसिंघे श्रीलंका के प्रधानमंत्री बने। सात मई 1993 को रानिल ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। हालांकि, उनका पहला कार्यकाल महज एक साल ही चला। 1994 में हुए आम चुनाव में उनकी पार्टी यूएनपी को चंद्रिका बंडारानयिके कुमारातुंगा की पीपुल्स अलायंस के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। यही वह दौर था, जब श्रीलंका में नेताओं की हत्या का दौर शुरू हुआ था। यूएनपी के भी कई वरिष्ठ नेता लिट्टे उग्रवादियों के निशाने पर आ गए। इसी के चलते विक्रमसिंघे को पार्टी के प्रमुख का पद संभालना पड़ा।

विक्रमसिंघे दूसरी बार 2001 से 2004 तक पीएम रहे। इसके बाद वे 2015 से 2019 के बीच अलग-अलग मौकों पर तीन बार पीएम पद पर रहे। अपने राजनीतिक करियर में विक्रमसिंघे छह बार पीएम रहे। उनका हालिया कार्यकाल इस साल मई में महिंदा राजपक्षे के इस्तीफे के बाद शुरू हुआ था। हालांकि, श्रीलंका में बढ़ते प्रदर्शनों की वजह से उन्हें जुलाई में ही इस्तीफा देना पड़ा। प्रदर्शनकारियों ने श्रीलंका लगातार बिगड़ती स्थिति को संभाल पाने में नाकामी का आरोप लगाते हुए विक्रमसिंघे के घर में भी आग लगा दी थी।

जब पार्टी के पास एक सीट तो राष्ट्रपति कैसे बने विक्रमसिंघे?
श्रीलंका की 225 सदस्यीय संसद में पूर्व पीएम रानिल विक्रमसिंघे की यूनाइटेड नेशनल पार्टी 2020 में हुए चुनाव में महज एक सीट है। देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के बावजूद यूएनपी 2020 में एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। यहां तक कि पार्टी अपने मजबूत गढ़ रहे कोलंबो में भी हार गई थी। इस सीट पर खुद रानिल विक्रमसिंघे ने चुनाव लड़ा था। बाद में वह क्यूमुलेटिव नेशनल वोट के आधार पर यूएनपी को आवंटित राष्ट्रीय सूची के माध्यम से संसद पहुंच सके। यूएनपी के पास संसद में यही एक सीट है।

इसके बावजूद मई 2022 में वे छठी बार श्रीलंका के प्रधानमंत्री नियुक्त किए गए। चौंकाने वाली बात यह है कि उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे ने अपने भाई महिंदा राजपक्षे को पीएम पद से हटाने के बाद की। वह भी तब जब उनकी पार्टी के पास बहुमत से ज्यादा आंकड़ें हैं।

1. बताया जाता है कि इसकी वजह विक्रमसिंघे का यही राजनीतिक अनुभव है। वित्त मामलों की बेहतर जानकारी की वजह से वे पीएम पद के लिए राजपक्षे परिवार की पहली पसंद रहे। अपनी इसी खूबी की वजह से वे श्रीलंकाई नेताओं की उस टीम का भी हिस्सा हैं, जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से तीन अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज पर बात कर रही है। इसके अलावा फिलहाल वे राज्य के खर्चों में कटौती वाले अंतरिम बजट को लाने की भी तैयारी कर रहे हैं।
2. विक्रमसिंघे ने पीएम रहते हुए भारत के अलावा चीन से भी अच्छे रिश्ते स्थापित किए थे। हालांकि, श्रीलंका के संकट के बीच चीन के दूरी बनाने की वजह से खुद विक्रमसिंघे ने भी चीन पर बयान नहीं दिया है। लेकिन उन्होंने भारत का शुक्रिया जरूर जताया है।
3. कई सांसदों का मानना है कि चूंकि यह राजनीतिक संकट से ज्यादा आर्थिक संकट है। इसलिए प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बावजूद संसद ने उन्हें राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी सौंपी है। अब राष्ट्रपति के तौर पर विक्रमसिंघे को राजपक्षे के कार्यकाल तक जिम्मेदारी निभाने का मौका मिलेगा, जो कि 2024 में खत्म होगा।

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