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तानसेन को दुनियाभर में संगीत सम्राट के रूप में जाना जाता है, अपने संगीत के चलते तानसेन ग्वालियर से दिल्ली में बादशाह अकबर दरबार पहुंचे और नौ रत्नों में शामिल हुए। ग्वालियर में तानसेन की याद में उनकी समाधि बनाई गई है देशभर से संगीत साधक सजदा करने आते है। मान्यता है कि समाधि पर लगा इमली का पेड़ के पत्ते खाने से आवाज़ सुरीली हो जाती है। उनकी याद में हर साल तानसेन संगीत समारोह होता है, जिसमे दुनियाभर के कलाकार अपनी प्रस्तुति देने आते हैं।ग्वालियर के तानसेन उर्फ रामतनु हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के एक महान ज्ञाता थे। तानसेन को सम्राट अकबर के नवरत्नों में भी गिना जाता है। ग्वालियर के बेहट गांव में रहने वाले तानसेन 5 साल की उम्र तक कुछ बोल नहीं पाते थे। परिवार के लोग तानसेन को ग्वालियर लाए, जहां उस्ताद मोहम्मद गौस ने तानसेन को गोद ले लिया और संगीत की तालीम शुरू की। धीरे- धीरे तानसेन की गायकी मशहूर हुई तो मुगल शासक अकबर ने अपने दरबार मे बुलाया और उन्हें अपने नौ रत्नों में शामिल कर लिया। तानसेन की सुरीली आवाज़ का जादू दुनियाभर में फैला था, लेकिन इस सुरीली आवाज़ की वजह था इमली का पेड़। बचपन मे तानसेन बोल नही पाते थे जब तानसेन ने इस करामाती इमली के पत्ते खाए तो वो बोलने लगे, उनकी आवाज़ न सिर्फ सुरीली हो गई बल्कि वो अकबर के 9 रत्नों में शामिल हुए और दुनियाभर में प्रसिद्धि पाई। संगीत की मान्यता के चलते देश विदेश से लोग इमली की पत्तियां तोड़ने आते हैं, लोग मानते है कि इस पेड़ की पत्तियां खाने से गला मीठा हो जाता है।ग्वालियर में हर साल “तानसेन संगीत समारोह” का आयोजन होता है।  समारोह में सबसे पहले समधि स्थल पर हरिकथा और मिलाद का आयोजन किया जाता  ढो़ली बुआ महाराज के शिष्य द्वारा तानसेन की समधि पर श्रद्धाजंलि दी जाती है, तो वही मुस्लिम समाज की और से उनके लिए मिलाद शरीफ का आयोजन होता है।  अंतर्राष्ट्रीय तानसेन समारोह की शुरूआत तत्तकालीन माधवराव सिंधिया ने 1924 में की थी। जिसके बाद से लगातार इस समारोह को मनाया जा रहा है। तानसेन का समाधि स्थल संगीत प्रेमियों के लिए तीर्थ की तरह हैं तो वही सैलानियों के लिए ये महान इतिहास का हिस्सा बन गया है। लोग आते हैं तानसेन के संगीत और उनकी रूह को यहां महसूस करते हैं। तानसेन के अद्भुत संगीत के चलते पांच सदियां बीतने के बाद भी उनकी याद अमर बनी हुई है।

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